उन्होंने शराबबंदी को महिलाओं के सम्मान और सामाजिक बदलाव से जोड़ते हुए कहा कि यह फैसला महिलाओं के समर्थन को ध्यान में रखते हुए लिया गया था। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि सरकार इस नीति से पीछे नहीं हटेगी।
यानी सरकार के सामने एक तरफ बड़ा राजस्व नुकसान है तो दूसरी तरफ शराबबंदी को सामाजिक नीति के रूप में जारी रखने का फैसला है।
क्या बिहार में हट सकती है शराबबंदी?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि मुख्यमंत्री पद में बदलाव के बाद बिहार की शराब नीति को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे थे। लेकिन मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हालिया बयान ने फिलहाल इन अटकलों पर विराम लगा दिया है।
सम्राट चौधरी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि बिहार में शराबबंदी खत्म नहीं की जाएगी। उन्होंने इसे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ऐतिहासिक फैसलों में से एक बताया और कहा कि सरकार इस नीति को जारी रखेगी।
इसका सीधा मतलब यह है कि फिलहाल शराब की कानूनी बिक्री शुरू करने या पूर्ण शराबबंदी हटाने की दिशा में सरकार की कोई घोषणा नहीं हुई है।
2016 में लागू हुई थी पूर्ण शराबबंदी
बिहार में शराबबंदी की शुरुआत अप्रैल 2016 में हुई थी। इसके तहत राज्य में शराब की बिक्री और सेवन पर व्यापक प्रतिबंध लागू किया गया। बाद में बिहार उत्पाद अधिनियम में संशोधन कर पूर्ण शराबबंदी को कानूनी आधार दिया गया।
इस नीति का उद्देश्य शराब के सेवन से जुड़े सामाजिक और पारिवारिक नुकसान को कम करना था। खासकर महिलाओं की ओर से शराबबंदी की मांग को इसके पीछे महत्वपूर्ण कारणों में बताया गया।
करीब एक दशक बाद भी शराबबंदी बिहार की सबसे चर्चित और बहस वाली नीतियों में बनी हुई है।
सरकार के लिए सबसे बड़ा सवाल—राजस्व या सामाजिक नीति?
शराबबंदी की चर्चा में सबसे बड़ा आर्थिक सवाल राजस्व का है। शराब की बिक्री से मिलने वाला टैक्स राज्य सरकार के लिए एक महत्वपूर्ण संभावित राजस्व स्रोत हो सकता है। ऐसे में जब मुख्यमंत्री खुद करीब ₹20 हजार करोड़ के नुकसान की बात कर रहे हैं, तो यह मुद्दा आर्थिक बहस को और बड़ा बनाता है।
लेकिन सरकार का तर्क यह है कि शराबबंदी का मूल्यांकन केवल शराब से मिलने वाले टैक्स के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
सरकार इसे महिलाओं की स्थिति, परिवारों पर असर और सामाजिक वातावरण से जोड़कर देखती है। मुख्यमंत्री ने भी अपने बयान में महिलाओं के समर्थन को शराबबंदी जारी रखने का प्रमुख आधार बताया है।
शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब बड़ी चुनौती
शराबबंदी के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती अवैध शराब की बिक्री और तस्करी है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी अवैध शराब के सेवन से होने वाली मौतों को लेकर चिंता जताई है।
कानून लागू होने के बाद भी शराब की अवैध सप्लाई को पूरी तरह रोकना प्रशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। सीमावर्ती क्षेत्रों से शराब की तस्करी, अवैध बिक्री और जहरीली शराब से जुड़े मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
यही वजह है कि शराबबंदी को लेकर बहस केवल इस बात तक सीमित नहीं है कि कानून रहना चाहिए या नहीं। बड़ा सवाल यह भी है कि कानून को प्रभावी तरीके से लागू कैसे किया जाए और अवैध कारोबार पर पूरी तरह लगाम कैसे लगे।
मुख्यमंत्री ने महिलाओं के सम्मान से क्यों जोड़ा शराबबंदी को?
सम्राट चौधरी ने शराबबंदी को बिहार की महिलाओं के सम्मान से जोड़ते हुए कहा कि यह फैसला महिलाओं के समर्थन को देखते हुए लिया गया था। उनके मुताबिक, राज्य की आधी आबादी इस नीति का समर्थन करती है।
सरकार का तर्क है कि शराब की वजह से परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक और सामाजिक दबाव को कम करने में शराबबंदी की भूमिका रही है।
हालांकि शराबबंदी के प्रभाव को लेकर अलग-अलग स्तर पर बहस जारी है और इसके सामाजिक तथा आर्थिक असर को अलग-अलग आंकड़ों के आधार पर देखा जाता है।
अपराध कम होने का भी मुख्यमंत्री ने किया दावा
मुख्यमंत्री ने शराबबंदी से जुड़े अपने बयान में अपराध में कमी का भी दावा किया है। उनका कहना है कि आने वाले समय में बिहार में अपराध और कम होगा तथा रोजगार और सुशासन पर सरकार का फोकस रहेगा।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि अपराध में कमी से जुड़े ऐसे राजनीतिक दावों को अलग-अलग अपराध आंकड़ों और संबंधित अवधि के आधिकारिक रिकॉर्ड के साथ देखना अधिक उचित होगा।
सरकार ने नशामुक्त बिहार अभियान पर भी दिया जोर
शराबबंदी की नीति के बीच बिहार सरकार ने नशामुक्ति को लेकर अभियान को भी आगे बढ़ाया है। 15 सितंबर 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ‘नशामुक्त बिहार बेहतर बिहार, बढ़ता बिहार’ अभियान के तहत तैयार आधिकारिक वेबसाइट का शुभारंभ किया।
मुख्यमंत्री ने इस मौके पर कहा कि नशामुक्त बिहार का निर्माण केवल सरकार के प्रयास से संभव नहीं है और इसके लिए समाज के सभी वर्गों की सक्रिय भागीदारी तथा जन-जागरूकता जरूरी है।
इससे संकेत मिलता है कि सरकार शराबबंदी के साथ-साथ व्यापक नशामुक्ति अभियान पर भी जोर दे रही है।
अगर ₹20 हजार करोड़ का नुकसान है तो सरकार इसकी भरपाई कैसे करेगी?
यही वह सवाल है जो आने वाले समय में बिहार की आर्थिक बहस में महत्वपूर्ण हो सकता है।
यदि सरकार शराबबंदी जारी रखती है और शराब से जुड़े संभावित राजस्व को स्वीकार नहीं करती, तो राज्य को वैकल्पिक राजस्व स्रोतों पर निर्भर रहना होगा। इसके लिए उद्योग, निवेश, रोजगार, व्यापार, पर्यटन और अन्य कर एवं गैर-कर स्रोतों से आय बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पहले भी बिहार की अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ाने, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा पलायन रोकने को लेकर सरकार का विजन सामने रख चुके हैं।
इस लिहाज से शराबबंदी का मुद्दा आने वाले वर्षों में केवल सामाजिक नीति नहीं, बल्कि राजस्व और विकास मॉडल से जुड़ा विषय भी बना रह सकता है।
बिहार में फिलहाल शराबबंदी की स्थिति क्या है?
मुख्यमंत्री के ताजा बयान के आधार पर फिलहाल स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है:
- बिहार में शराबबंदी जारी रहेगी।
- सरकार शराबबंदी हटाने के पक्ष में नहीं है।
- मुख्यमंत्री ने करीब ₹20 हजार करोड़ सालाना राजस्व नुकसान की बात कही है।
- सरकार इस नुकसान के बावजूद नीति में समझौता नहीं करना चाहती।
- शराबबंदी को महिलाओं के सम्मान और सामाजिक बदलाव से जोड़ा गया है।
- अवैध और जहरीली शराब पर नियंत्रण अभी भी बड़ी चुनौती है।
- सरकार ने नशामुक्त बिहार अभियान को भी आगे बढ़ाया है।
अब आगे क्या? शराबबंदी की असली परीक्षा यहीं से शुरू
बिहार में शराबबंदी खत्म होगी या नहीं, इस सवाल का जवाब मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने फिलहाल साफ कर दिया है—सरकार पाबंदी हटाने नहीं जा रही है।
लेकिन असली चुनौती अब शराबबंदी को जारी रखने से आगे की है। सरकार के सामने एक साथ कई सवाल हैं—अवैध शराब पर कैसे पूरी तरह रोक लगेगी? सीमावर्ती इलाकों से तस्करी कैसे रुकेगी? जहरीली शराब से होने वाली मौतों को कैसे नियंत्रित किया जाएगा? और सबसे अहम, शराब से मिलने वाले संभावित राजस्व की भरपाई के लिए राज्य अपनी अर्थव्यवस्था को किस तरह मजबूत करेगा?
एक तरफ सरकार इसे महिलाओं और सामाजिक हित से जुड़ा फैसला बता रही है, तो दूसरी तरफ खुद मुख्यमंत्री द्वारा बताए गए ₹20 हजार करोड़ के राजस्व नुकसान ने आर्थिक पक्ष को भी बहस के केंद्र में ला दिया है।
इसलिए आने वाले समय में बिहार की शराब नीति की सबसे बड़ी कहानी सिर्फ “शराबबंदी रहेगी या हटेगी” नहीं होगी, बल्कि यह होगी कि सरकार शराबबंदी को कायम रखते हुए राजस्व, रोजगार, कानून-व्यवस्था और नशामुक्ति—इन सभी मोर्चों पर अपना मॉडल कितना प्रभावी बना पाती है।
फिलहाल मुख्यमंत्री का संदेश स्पष्ट है—राजस्व नुकसान के बावजूद शराबबंदी जारी रहेगी।
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