गेरुवा नदी के कटाव से संकट में बादे गांव, बांध का 90% हिस्सा नदी में समाया

बांध का करीब 90 फीसदी हिस्सा नदी में समाया, ग्रामीण रात-रात भर कर रहे निगरानी; एक साल पहले मिले आश्वासन के बाद भी नहीं हुआ स्थायी समाधान
बसंतराय, गोड्डा। बसंतराय प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत धपरा पंचायत के बादे गांव के समीप बिहार-झारखंड सीमा से होकर गुजरने वाली गेरुवा नदी के तेज कटाव ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है। नदी के लगातार बढ़ते कटाव के कारण बांध का करीब 90 फीसदी हिस्सा नदी में समा चुका है। बांध का जो हिस्सा अभी बचा हुआ है, वह भी लगातार कटाव की जद में है। ग्रामीणों को आशंका है कि यदि समय रहते बचाव कार्य नहीं किया गया तो बांध का शेष हिस्सा भी नदी में समा सकता है और आसपास के कई गांवों में बाढ़ जैसे हालात उत्पन्न हो सकते हैं।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार वर्तमान स्थिति बेहद गंभीर है। नदी के बहाव के साथ लगातार मिट्टी कट रही है और बांध कमजोर होता जा रहा है। कटाव जिस गति से बढ़ रहा है, उससे ग्रामीणों में यह डर बना हुआ है कि अचानक बांध टूटने की स्थिति में उन्हें संभलने का पर्याप्त समय भी नहीं मिल पाएगा।
एक साल पहले भी सामने आया था कटाव का मामला
ग्रामीणों का कहना है कि बांध में कटाव की समस्या कोई नई नहीं है। वर्ष 2025 में भी बादे गांव के समीप बांध का कटाव शुरू हुआ था। उस समय अवतार न्यूज ने ग्रामीणों की समस्या को प्रमुखता से उठाया था। खबर सामने आने के बाद प्रखंड विकास पदाधिकारी सहित संबंधित अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर बांध का निरीक्षण किया था।
निरीक्षण के दौरान ग्रामीणों को तत्काल राहत के तौर पर कटाव को रोकने के लिए बांस और बोरों की व्यवस्था किए जाने का आश्वासन दिया गया था। ग्रामीणों के अनुसार उस समय उन्हें भरोसा दिलाया गया था कि जल्द ही आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराकर कटाव को रोकने का प्रयास किया जाएगा।
लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि आश्वासन के बाद भी धरातल पर अपेक्षित काम नहीं हुआ। करीब एक साल बीतने को है, लेकिन न तो बांस की पर्याप्त व्यवस्था हुई और न ही बोरे लगाकर कटाव को रोकने की स्थायी या प्रभावी व्यवस्था की गई। इस दौरान नदी का कटाव लगातार बढ़ता गया और अब बांध का बड़ा हिस्सा नदी में समा चुका है।
रात में भी बांध की निगरानी कर रहे ग्रामीण
बांध की मौजूदा स्थिति को देखते हुए बादे और आसपास के गांवों के ग्रामीणों में भय का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें दिन के साथ-साथ रात में भी बांध की स्थिति पर नजर रखनी पड़ रही है। नदी के कटाव की आवाज और लगातार मिट्टी के नदी में समाने से लोगों को किसी बड़े खतरे की आशंका बनी रहती है।
ग्रामीणों का कहना है कि इस क्षेत्र के लोगों ने पहले भी गेरुवा नदी का रौद्र रूप देखा है। इसलिए वर्तमान स्थिति को लेकर उनकी चिंता केवल बांध तक सीमित नहीं है, बल्कि आसपास के घरों, खेतों और गांवों की सुरक्षा को लेकर भी है।
पुराने बाढ़ के जख्म आज भी हैं ताजा
गेरुवा नदी से जुड़े पुराने बाढ़ के अनुभव ग्रामीणों की चिंता को और बढ़ा रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 1995, 1999, 2000, 2003, 2004 और 2005 में क्षेत्र में बाढ़ का गंभीर असर देखने को मिला था।
ग्रामीण बताते हैं कि उस दौरान कई इलाकों में पानी भर गया था। खेतों में लगी फसलें बर्बाद हुई थीं और कई जगह बाढ़ का पानी उतरने के बाद खेतों में बालू जमा हो गई थी। इससे खेती प्रभावित हुई और ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा।
ग्रामीणों का कहना है कि उन बाढ़ के दिनों को वे आज भी नहीं भूले हैं। यही वजह है कि गेरुवा नदी के किनारे बांध का इतना बड़ा हिस्सा कट जाने के बाद लोगों में पुराने हालात दोबारा लौटने की आशंका पैदा हो गई है।
बांध टूटा तो कई गांव हो सकते हैं प्रभावित
ग्रामीणों के अनुसार यदि बादे गांव के समीप बांध का बचा हुआ हिस्सा भी टूट जाता है तो नदी का पानी आसपास के निचले इलाकों में तेजी से फैल सकता है। इससे कई गांव प्रभावित हो सकते हैं। खेतों में पानी भरने के साथ-साथ ग्रामीण आवागमन, सड़क और घरों को भी नुकसान पहुंचने की आशंका है।
ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसे में किसी भी तरह की लापरवाही भविष्य में बड़ी समस्या का कारण बन सकती है।
ग्रामीणों का सवाल—एक साल बाद भी क्यों नहीं हुआ काम?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वर्ष 2025 में ही बांध के कटाव की जानकारी प्रशासन तक पहुंच गई थी और अधिकारियों ने मौके पर जाकर स्थिति का निरीक्षण भी किया था, तब समय रहते स्थायी समाधान क्यों नहीं किया गया?
ग्रामीणों का कहना है कि यदि शुरुआती दौर में ही कटाव रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाते तो शायद आज बांध का इतना बड़ा हिस्सा नदी में नहीं समाता। अब स्थिति उस स्तर तक पहुंच चुकी है जहां केवल खानापूर्ति से काम नहीं चलेगा।
स्थायी समाधान की मांग
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल विशेषज्ञों या संबंधित विभाग के अधिकारियों से बांध का निरीक्षण कराया जाए। कटाव की वास्तविक स्थिति का आकलन कर तत्काल सुरक्षा उपाय किए जाएं और भविष्य के लिए मजबूत एवं स्थायी व्यवस्था की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि केवल बांस और बोरे के सहारे लंबे समय तक बांध को सुरक्षित रखना संभव नहीं होगा। बांध के जिस हिस्से का बड़ा भाग कट चुका है, वहां तकनीकी रूप से मजबूत सुरक्षा कार्य कराने की आवश्यकता है।
ग्रामीणों ने प्रशासन से यह भी मांग की है कि यदि बांध टूटने की स्थिति बनती है तो उससे प्रभावित होने वाले गांवों की पहचान पहले से की जाए और आपात स्थिति के लिए आवश्यक तैयारी रखी जाए।
अब प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी ग्रामीणों की नजर
बादे गांव के ग्रामीणों के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल अपनी सुरक्षा का है। एक ओर गेरुवा नदी लगातार बांध को काट रही है, दूसरी ओर पुराने बाढ़ के अनुभव लोगों को डरा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को किसी बड़े हादसे का इंतजार करने के बजाय अभी से प्रभावी कदम उठाना चाहिए।
वर्ष 2025 में मामला सामने आने के बाद निरीक्षण और तत्काल व्यवस्था के आश्वासन से ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी, लेकिन करीब एक साल बाद भी कटाव का बढ़ता दायरा उन उम्मीदों पर सवाल खड़े कर रहा है।
अब देखना यह है कि बांध की मौजूदा गंभीर स्थिति को देखते हुए प्रशासन कितनी जल्दी मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का आकलन करता है और ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।
ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है—बांध टूटने और बाढ़ की स्थिति पैदा होने से पहले कार्रवाई हो, ताकि बादे और आसपास के गांवों को संभावित बड़े नुकसान से बचाया जा सके।
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