Election Commission Investigation: 10 महीने, 14 आपत्तियां और अब आगे क्या? Ritika Chopra ने बताया कैसे सामने आई EC के अंदर की कहानी

नई दिल्ली: देश में मतदाता सूची के Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चल रही बहस के बीच The Indian Express की एक विस्तृत investigation ने Election Commission of India यानी ECI के कामकाज को लेकर एक नया सवाल खड़ा किया है रिपोर्टर Ritika Chopra और Damini Nath की investigation के अनुसार, तीन सदस्यीय Election Commission के दो सदस्यों—Election Commissioner Sukhbir Singh Sandhu और Election Commissioner Vivek Joshi—ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 बार कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की।
इन आपत्तियों का संबंध केवल किसी प्रशासनिक या तकनीकी मुद्दे से नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने और जोड़ने, SIR के दौरान लिए गए फैसलों, चुनावी डेटा और सॉफ्टवेयर तक अधिकारियों की पहुंच तथा West Bengal में मतदाता सूची से जुड़े मामलों में दाखिल की गई अपीलों जैसे गंभीर विषय शामिल थे।
इस पूरी कहानी को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि Ritika Chopra और उनकी टीम ने आखिर यह investigation तैयार कैसे की।
10 महीने तक दस्तावेजों और अंदरूनी रिकॉर्ड की पड़ताल
The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार investigation किसी एक घटना पर आधारित नहीं थी। रिपोर्टरों ने करीब 10 महीनों के दौरान Election Commission के भीतर दर्ज की गई लिखित टिप्पणियों, objections, communications और अधिकारियों के बीच हुए पत्राचार को देखा।
इस पूरी पड़ताल में नवंबर 2025 से अगस्त 2026 तक की घटनाओं को जोड़ा गया। यानी किसी एक दिन का विवाद नहीं, बल्कि अलग-अलग समय पर सामने आए घटनाक्रमों को दस्तावेजों के आधार पर एक timeline में रखा गया।
Ritika Chopra और Damini Nath की रिपोर्टिंग में सबसे महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि दो Election Commissioners की आपत्तियां केवल मौखिक मतभेद के तौर पर सामने नहीं आईं। कई मामलों में उनकी आपत्तियां रिकॉर्ड पर दर्ज थीं और Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar को भी इसकी जानकारी दी गई थी।
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों Commissioners ने कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की और एक दिन में ही चार बार आपत्ति दर्ज किए जाने की बात सामने आई।
कहानी की शुरुआत कहां से हुई?
इस investigation का बड़ा हिस्सा Special Intensive Revision यानी SIR से जुड़ा है।
SIR की शुरुआत जून 2025 में बिहार से हुई थी। इसके बाद इसे दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। The Indian Express के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर SIR के draft rolls में 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की बात सामने आई।
इसी दौरान मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने और बहाल करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे।
यहां से investigation ने एक महत्वपूर्ण सवाल तलाशना शुरू किया—क्या Election Commission के भीतर सभी बड़े फैसलों को लेकर तीनों Commissioners के बीच समान जानकारी और सहमति थी?
इसी सवाल का जवाब खोजते हुए रिपोर्टरों ने अलग-अलग मामलों से जुड़े दस्तावेजों को जोड़ना शुरू किया।
पहला बड़ा मामला—Form 6 में बदलाव
Investigation का सबसे अहम हिस्सा नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 से जुड़ा है।
Form 6 वह statutory form है जिसका इस्तेमाल पात्र व्यक्ति नए मतदाता के रूप में अपना नाम दर्ज कराने के लिए करता है।
रिपोर्ट के मुताबिक 2026 में इस form को ECINet portal पर बदल दिया गया और इसमें SIR से जुड़ा एक नया declaration दिखाई देने लगा।
नए आवेदक से पूछा जा रहा था कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछले SIR के दौरान electoral roll में था या नहीं।
महत्वपूर्ण बात यह थी कि Form 6 में जोड़ा गया यह सवाल भले ही अलग से mandatory के रूप में चिह्नित नहीं था, लेकिन इसके जवाब के बिना आवेदन आगे नहीं बढ़ पा रहा था।
मई में ही उठ गई थी आपत्ति
Ritika Chopra की investigation के मुताबिक Form 6 में बदलाव को लेकर मामला मई 2026 में ही Election Commission के भीतर उठ चुका था।
16 मई को Election Commissioner Vivek Joshi ने इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज की। उनकी दलील थी कि Form 6 एक statutory form है और इसे केवल SIR के किसी आदेश या guideline के माध्यम से बदला नहीं जा सकता।
उनके अनुसार इसके लिए Registration of Electors Rules, 1960 में आवश्यक संशोधन की प्रक्रिया अपनानी होगी।
19 मई को Election Commissioner Sukhbir Singh Sandhu ने भी Joshi की आपत्ति से सहमति जताई।
यानी रिपोर्ट के अनुसार दो Commissioners ने पहले ही रिकॉर्ड पर यह सवाल उठा दिया था कि Form 6 में ऐसा बदलाव कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप है या नहीं।
फिर जुलाई में Indian Express ने Form 6 पर रिपोर्ट की
12 जुलाई को The Indian Express ने पहली बार इस नए declaration की जानकारी सार्वजनिक की।
इसके बाद 13 अगस्त को Sukhbir Singh Sandhu ने अधिकारियों को लिखित रूप से इस मामले को उठाया।
रिपोर्ट के मुताबिक Sandhu ने याद दिलाया कि दो Commissioners पहले ही इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज कर चुके थे। उन्होंने इसे “unauthorised” और “illegal” बताया और Form 6 को तुरंत मूल स्थिति में वापस करने की मांग की।
उनकी चिंता विशेष रूप से उन युवाओं को लेकर थी जो पहली बार मतदाता बनने वाले थे।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि किसी व्यक्ति का मतदाता बनने का अधिकार उसकी अपनी उम्र, नागरिकता और निवास जैसी वैधानिक योग्यताओं से जुड़ा है; उसके माता-पिता का पिछली मतदाता सूची में नाम था या नहीं, यह एक अलग सवाल है।
दूसरा बड़ा सवाल—मतदाता डेटा किसके नियंत्रण में?
Investigation यहीं नहीं रुकी।
दूसरा बड़ा मामला Election Commission के electoral-roll database और उसके software system से जुड़ा था।
रिपोर्ट के अनुसार पहले Electoral Registration Officers यानी EROs को मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण statutory भूमिका प्राप्त थी।
लेकिन दोनों Commissioners ने इस बात पर चिंता जताई कि ECINet और उससे जुड़े IT systems में धीरे-धीरे access का केंद्रीकरण हो रहा है।
उनकी चिंता यह थी कि अगर जमीन पर काम करने वाले statutory अधिकारियों की database तक पहुंच सीमित हो जाती है, तो मतदाता सूची तैयार करने की पारंपरिक decentralized व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
मामला इतना गंभीर हुआ कि Cabinet Secretary तक पहुंची बात
Investigation के मुताबिक जब IT division और electoral-roll database के नियंत्रण को लेकर सवाल बढ़े, तो दोनों Election Commissioners ने Cabinet Secretary T V Somanathan को भी अलग-अलग पत्र लिखे।
यह सामान्य प्रशासनिक disagreement से आगे की स्थिति इसलिए मानी गई क्योंकि मामला सीधे electoral roll के IT backbone और अधिकारियों की powers से जुड़ गया था।
रिपोर्ट के मुताबिक दोनों Commissioners ने database के “gradual centralisation” को लेकर चिंता जताई और यह सवाल उठाया कि क्या statutory officers की access को सीमित करने का अधिकार संबंधित IT authorities के पास था।
तीसरा मामला—West Bengal में 38 लाख appeals
Investigation में West Bengal से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण मामला सामने आया।
रिपोर्ट के अनुसार SIR के बाद electoral roll से जुड़े मामलों में करीब 38 लाख appeals pending थीं।
इनमें 22.21 लाख appeals ऐसे मतदाताओं की थीं जिनके नाम हटाए गए थे और वे अपना नाम वापस शामिल कराने की मांग कर रहे थे।
वहीं करीब 16.10 लाख appeals ऐसे मामलों से संबंधित थीं जिनमें judicial officers द्वारा किसी मतदाता को शामिल किए जाने के खिलाफ appeal की गई थी।
यहीं Election Commissioner Sukhbir Singh Sandhu ने सवाल उठाया कि Election Commission की ओर से इन appeals को दाखिल करने की अनुमति किसने दी और इन्हें दाखिल किसने किया।
उनके मुताबिक न तो उन्हें, न Vivek Joshi को और न ही उस समय के West Bengal Chief Electoral Officer को इस प्रक्रिया के आधार की जानकारी दी गई थी।
चौथा मामला—Goa के 97 मतदाता
Investigation का एक और उदाहरण Goa से सामने आया।
रिपोर्ट के मुताबिक Supreme Court के निर्देशों के बाद अधिकारियों ने कुछ मतदाताओं के मामलों की जांच की थी। Goa में 97 मतदाताओं को स्थानीय Electoral Registration Officers ने eligible पाया।
लेकिन समस्या software system में सामने आई।
रिपोर्ट के अनुसार software में ऐसा mechanism उपलब्ध नहीं था जिससे ERO के फैसले को उस तरीके से दर्ज किया जा सके कि इन 97 मतदाताओं के नाम final electoral roll में शामिल किए जा सकें।
Goa के अधिकारियों ने इस समस्या को लेकर कई बार emails भेजे। The Indian Express के मुताबिक सात दिनों में आठ emails भेजे गए, लेकिन final roll में इन 97 मतदाताओं के नाम नहीं आ सके।
हालांकि बाद में Goa के Chief Electoral Officer ने कहा कि इन 97 मामलों को अलग तरीके से process किया गया था।
यानी इस मामले में आगे की स्थिति को केवल “97 नाम हमेशा के लिए हट गए” के रूप में नहीं लिखा जाना चाहिए। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक Goa CEO ने बाद में कहा कि इन मामलों को अलग से process किया गया।
14 आपत्तियों का सबसे बड़ा सवाल क्या है?
पूरी investigation का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा संख्या नहीं, बल्कि उन objections की प्रकृति है।
रिपोर्ट के अनुसार दो Commissioners ने अलग-अलग समय पर मतदाता जोड़ने, मतदाता हटाने, Form 6, electoral-roll database, software access और appeals जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए।
इनमें से कई communications Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar को भी भेजे गए थे।
इसलिए investigation का मूल प्रश्न यह नहीं है कि Election Commission के अंदर कभी मतभेद हुए या नहीं।
मूल प्रश्न यह है कि जब एक ही संवैधानिक संस्था के तीन सदस्यों में से दो सदस्य किसी प्रक्रिया पर औपचारिक आपत्ति दर्ज करते हैं, तो उन आपत्तियों पर अंतिम निर्णय कैसे हुआ और क्या उनका समाधान रिकॉर्ड पर दर्ज किया गया?
Election Commission ने क्या कहा?
Investigation सामने आने के बाद Election Commission ने 24 सितंबर को अपनी प्रतिक्रिया दी।
EC ने 14 notes के अस्तित्व, उनकी तारीख या उनके content को खारिज नहीं किया।
हालांकि Commission ने कहा कि अलग-अलग views और observations किसी भी institution की decision-making process का हिस्सा होते हैं।
EC के मुताबिक written notes, technical suggestions और internal checks and balances सामान्य और लगातार चलने वाली प्रक्रिया हैं।
Commission ने यह भी कहा कि Commissioners द्वारा दिए गए सुझाव electoral process को और बेहतर बनाने के लिए थे और Commission के निर्णय unanimous रहे।
लेकिन The Indian Express की रिपोर्ट के अनुसार Commission ने उन specific सवालों का जवाब नहीं दिया कि Form 6 में बदलाव किस प्रक्रिया से हुआ, West Bengal में appeals किसने authorize कीं और कुछ administrative फैसलों में दोनों Commissioners की आपत्तियों का अंतिम समाधान क्या हुआ।
9 सितंबर की बैठक क्यों महत्वपूर्ण है?
Investigation के अनुसार 9 सितंबर को CEC Gyanesh Kumar, Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi की पूरी Commission के रूप में बैठक हुई।
रिपोर्ट में कहा गया कि यह चार महीने में पहली full meeting थी।
अब आगे की प्रक्रिया में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इन बैठकों में पहले दर्ज की गई आपत्तियों पर कोई औपचारिक निर्णय या स्पष्टीकरण दर्ज होता है।
अब मामला संसद तक पहुंच सकता है?
Investigation के बाद राजनीतिक स्तर पर भी प्रतिक्रिया तेज हुई है।
The Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक Opposition ने Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar को हटाने के लिए Parliament में motion लाने की तैयारी की बात कही है।
लेकिन यह समझना जरूरी है कि केवल राजनीतिक घोषणा से CEC पद से हटाना अपने आप नहीं हो जाता।
CEC को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया अलग है और इसके लिए संसद में निर्धारित प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।
The Indian Express ने 25 सितंबर की अपनी रिपोर्ट में बताया कि Opposition की ओर से दोनों सदनों में motion के notices लाने की तैयारी की बात सामने आई है।
पहले भी removal motion की कोशिश हो चुकी है
यह भी इस पूरे मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इससे पहले मार्च 2026 में Opposition parties ने Gyanesh Kumar को हटाने के लिए दोनों सदनों में notices दिए थे।
रिपोर्ट के अनुसार Lok Sabha notice पर 130 MPs और Rajya Sabha notice पर 63 MPs के हस्ताक्षर थे।
लेकिन 6 अप्रैल को Rajya Sabha Chairman C P Radhakrishnan ने notice को स्वीकार नहीं किया। उनके आदेश में कहा गया कि लगाए गए आरोप Article 324(5) और Article 124(4) के तहत removal के लिए जरूरी prima facie “misbehaviour” को स्थापित नहीं करते थे।
इसलिए अब यदि नया motion लाया जाता है, तो उसका आगे का रास्ता संसदीय नियमों और संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
अब आगे क्या होने वाला है?
फिलहाल इस पूरे मामले में चार स्तरों पर घटनाक्रम महत्वपूर्ण रहेगा।
पहला—Election Commission का अगला कदम
सबसे पहले यह देखना होगा कि Commission अपने internal objections और सामने आए सवालों पर कोई विस्तृत स्पष्टीकरण, review या administrative action करता है या नहीं।
26 सितंबर की रिपोर्टों में ECI द्वारा voter-roll changes की review प्रक्रिया और SIR से जुड़े procedural बदलावों की खबरें भी सामने आई हैं।
दूसरा—Parliament में संभावित कार्रवाई
Opposition की ओर से CEC के खिलाफ removal motion की तैयारी की बात सामने आई है।
यदि notice औपचारिक रूप से पेश होता है, तो उसके बाद संसद के दोनों सदनों में निर्धारित संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया लागू होगी।
यह प्रक्रिया लंबी हो सकती है और केवल investigation प्रकाशित होने से CEC की तत्काल removal नहीं होती।
तीसरा—Supreme Court और SIR से जुड़े मामले
SIR और electoral-roll disputes से जुड़े कई मुद्दे पहले से न्यायिक प्रक्रिया में हैं।
The Indian Express के अनुसार Supreme Court ने SIR के कुछ मामलों में judicial officers की भूमिका तय की थी और बाद में tribunals के जरिए appeals की प्रक्रिया भी सामने आई।
इसलिए आने वाले समय में court proceedings और Election Commission के affidavits भी महत्वपूर्ण होंगे।
चौथा—मतदाता सूची में सुधार और appeals
सबसे सीधा असर आम मतदाता पर पड़ सकता है।
अगर किसी व्यक्ति का नाम electoral roll में नहीं है या SIR के दौरान हटाया गया है, तो उसके लिए claims, objections और appeals की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
EC ने 26 सितंबर को Delhi और Maharashtra में claims और objections की deadlines बढ़ाने तथा doorstep verification, online hearings और vulnerable voters के लिए सहायता जैसे कदमों की घोषणा की है।
आखिर Ritika Chopra की investigation इतनी महत्वपूर्ण क्यों बनी?
Ritika Chopra की reporting का महत्व इस बात में है कि investigation केवल राजनीतिक बयानों पर आधारित नहीं है।
रिपोर्ट में internal notes, official communications और अलग-अलग राज्यों के अधिकारियों से जुड़ी घटनाओं को जोड़कर एक chronology तैयार की गई।
इसी chronology में नवंबर 2025 से अगस्त 2026 तक अलग-अलग समय पर दर्ज आपत्तियां सामने आईं।
इसके बाद The Indian Express ने Election Commission से सवाल भी पूछे।
रिपोर्ट के मुताबिक 21 सितंबर को Commission को questionnaire भेजा गया। दोनों Election Commissioners को भी email भेजकर पूछा गया कि उनकी आपत्तियों का समाधान हुआ या नहीं और क्या 9 सितंबर की बैठक में इन मुद्दों पर चर्चा हुई। इसके बाद phone calls से भी follow-up किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक उस समय कोई जवाब नहीं मिला।
यही दस्तावेजी श्रृंखला इस investigation की रीढ़ बनी।
अब सबसे बड़ा सवाल
इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा सवाल केवल यह नहीं है कि Election Commission के दो सदस्यों ने 14 बार आपत्ति क्यों दर्ज की।
बड़ा सवाल यह है कि इन आपत्तियों का संस्थागत समाधान कैसे हुआ?
क्या हर objection का जवाब रिकॉर्ड पर मौजूद है?
क्या Form 6 में बदलाव के लिए आवश्यक कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई?
क्या electoral-roll database और ECINet तक statutory अधिकारियों की पहुंच पहले जैसी रही?
West Bengal में लाखों appeals किस authority से दाखिल हुईं?
Goa के 97 मतदाताओं के मामले में software और ground-level officers के निर्णय के बीच जो समस्या सामने आई, उसका स्थायी समाधान क्या हुआ?
और सबसे महत्वपूर्ण—आम मतदाता यह कैसे सुनिश्चित करे कि उसका नाम मतदाता सूची में सही तरीके से मौजूद है?
इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में Election Commission के official decisions, Parliament में होने वाली कार्रवाई और अदालतों में चल रही proceedings से स्पष्ट होंगे।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि The Indian Express की investigation ने Election Commission के भीतर दर्ज dissent को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है। वहीं Election Commission का कहना है कि अलग-अलग observations उसकी सामान्य decision-making और internal checks-and balances प्रक्रिया का हिस्सा हैं। इसलिए आगे की तस्वीर केवल राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों, न्यायिक आदेशों और Election Commission की अगली कार्रवाइयों से साफ होगी।
नोट: यह रिपोर्ट The Indian Express की प्रकाशित investigation और उसके बाद सामने आए आधिकारिक/मीडिया updates के आधार पर तैयार की गई है। जहां किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति का आरोप/दावा है, उसे तथ्य के रूप में नहीं बल्कि संबंधित पक्ष के बयान के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
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