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सजने लगे अखड़े: प्रकृति, प्रेम और परंपरा का पर्व करम, झारखंड में अंतिम चरण में तैयारियां; जानें क्यों है खास?

सजने लगे अखड़े: प्रकृति, प्रेम और परंपरा का पर्व करम, झारखंड में अंतिम चरण में तैयारियां; जानें क्यों है खास?

झारखंड में करम पर्व को लेकर सजाया जा रहा पारंपरिक अखड़ा
करम पर्व को लेकर झारखंड के विभिन्न जिलों में अखड़ों की सफाई और सजावट का काम अंतिम चरण में है।

रांची: झारखंड की मिट्टी, जंगल, प्रकृति और लोकसंस्कृति से गहराई से जुड़ा करम पर्व अब अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है। राजधानी रांची समेत राज्य के अलग-अलग जिलों में करम पूजा को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। गांवों से लेकर शहरों तक अखड़ों की साफ-सफाई, सजावट, करम डाली की व्यवस्था और पारंपरिक गीत-संगीत व नृत्य की तैयारियां जोर पकड़ चुकी हैं।

इस वर्ष करम पूजा 22 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। कई स्थानों पर पूजा समितियां और सामाजिक संगठन आयोजन को पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाने की तैयारी कर रहे हैं।

करम पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है। यह झारखंड की आदिवासी और लोक परंपराओं में प्रकृति के प्रति सम्मान, भाई-बहन के रिश्ते, अच्छी फसल, सुख-समृद्धि और सामुदायिक एकता का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।

अखड़ों में दिखने लगी पर्व की रौनक

करम पर्व से पहले अखड़ों की सफाई और सजावट का काम तेज हो गया है। गांवों में युवक-युवतियां और स्थानीय समितियां मिलकर अखड़े को तैयार कर रही हैं। वहीं रांची जैसे शहरी इलाकों में पूजा स्थलों पर सफाई, रोशनी, पेयजल और अन्य नागरिक सुविधाओं को दुरुस्त करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

रांची नगर निगम ने शहर के 53 वार्डों में चिन्हित 298 सरना स्थलों और अखड़ों पर विशेष व्यवस्था करने की तैयारी की है। निगम की ओर से सफाई, स्ट्रीट लाइट, सड़क, पेयजल और अन्य सुविधाओं को दुरुस्त करने के निर्देश दिए गए हैं।

अखड़ों और पूजा स्थलों पर घास-पौधों की सफाई, कचरा हटाने और संपर्क मार्गों को व्यवस्थित करने का काम भी किया जा रहा है। भीड़ को देखते हुए कई स्थानों पर अतिरिक्त प्रकाश और दूसरी जरूरी व्यवस्थाओं पर भी जोर है।

क्या है करम पर्व का महत्व?

झारखंड सरकार के अनुसार करम पर्व करम देवता की पूजा से जुड़ा पर्व है। इसे शक्ति, युवा ऊर्जा और जीवन्तता से जुड़े लोकपर्व के रूप में बताया गया है। पर्व के दौरान युवा समूह जंगल से लकड़ी, फल और फूल जैसी पूजन सामग्री लाते हैं और सामूहिक रूप से गीत-संगीत व नृत्य करते हैं।

यही वजह है कि करम पर्व में प्रकृति का स्थान सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। करम की डाली को अखड़े में स्थापित कर पूजा की जाती है और इसके आसपास सामूहिक रूप से पारंपरिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

भाई-बहन के प्रेम का भी प्रतीक

करम पर्व को भाई-बहन के स्नेह और रिश्ते से भी जोड़ा जाता है। कई समुदायों में महिलाएं और युवतियां व्रत रखकर भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करती हैं।

पूजा के दौरान करम डाली के सामने पारंपरिक विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसके बाद रातभर गीत-संगीत और नृत्य का माहौल बनता है।

यही कारण है कि करम पर्व में धार्मिक आस्था के साथ-साथ परिवार और समाज को जोड़ने वाली भावना भी दिखाई देती है।

करम डाली क्यों होती है खास?

करम पर्व की सबसे प्रमुख पहचान करम की डाली है। इसे विशेष सम्मान के साथ अखड़े में स्थापित किया जाता है। परंपरा के अनुसार युवक करम की डाली लाते हैं और पूजा स्थल पर इसे स्थापित किया जाता है।

इसके बाद महिलाएं और समुदाय के लोग पूजा-अर्चना करते हैं। कई क्षेत्रों में करम की तीन डालियों को भी स्थापित करने की परंपरा बताई जाती है।

यह पूरी परंपरा प्रकृति और मानव जीवन के बीच संबंध को दर्शाती है।

मांदर की थाप पर गूंजेंगे पारंपरिक गीत

करम पर्व की कल्पना पारंपरिक गीत और नृत्य के बिना अधूरी मानी जाती है। पर्व के दौरान अखड़ों में मांदर, नगाड़े और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की आवाज सुनाई देती है।

रांची और झारखंड के दूसरे हिस्सों में करम को लेकर नागपुरी, सादरी, खोरठा, संथाली, कुरमाली और अन्य स्थानीय भाषाओं में गीत-संगीत की तैयारियां भी चल रही हैं। इस वर्ष करम पर्व को लेकर झारखंडी संगीत जगत में भी खास उत्साह देखने को मिल रहा है।

गांवों में जहां पारंपरिक नृत्य और मांदर की थाप अब भी पर्व का प्रमुख हिस्सा है, वहीं शहरों में आधुनिक संगीत और डीजे का प्रभाव भी देखने को मिलता है। इसके बावजूद कई समितियां पारंपरिक स्वरूप को बनाए रखने पर जोर दे रही हैं।

गांव और शहर में अलग-अलग रंग

करम पर्व की खूबसूरती यह है कि इसका मूल भाव समान रहते हुए अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी परंपराओं में कुछ अंतर दिखाई देता है।

गांवों में अखड़ा सामुदायिक जीवन का केंद्र बन जाता है। लोग मिलकर सफाई करते हैं, पूजा की तैयारी करते हैं और सामूहिक रूप से नृत्य-गीत में शामिल होते हैं।

शहरी क्षेत्रों में भी अब करम पर्व का विस्तार हुआ है। रांची जैसे शहरों में विभिन्न मोहल्लों और संस्थानों में करम पूजा समितियां आयोजन करती हैं। यहां पारंपरिक कार्यक्रमों के साथ सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी आयोजित की जाती हैं।

अच्छी फसल और खुशहाली की कामना

करम पर्व का संबंध कृषि और प्रकृति से भी गहरा है। झारखंड में खेती-किसानी से जुड़े समुदायों के लिए यह पर्व वर्ष के महत्वपूर्ण अवसरों में शामिल है।

मान्यता और लोकपरंपराओं में करम पर्व के माध्यम से अच्छी फसल, परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य और समृद्धि की कामना की जाती है। यही वजह है कि खेतों और प्रकृति से जुड़े इस पर्व में पेड़-पौधों और हरियाली का विशेष महत्व दिखाई देता है।

झारखंड से बाहर भी मनाया जाता है करम

करम पर्व की सांस्कृतिक पहुंच केवल झारखंड तक सीमित नहीं है। अलग-अलग परंपराओं और स्थानीय रीति-रिवाजों के साथ यह पर्व ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश और अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में भी मनाया जाता है।

हालांकि झारखंड में करम पर्व की सांस्कृतिक पहचान विशेष रूप से मजबूत है। यहां इसके आयोजन में स्थानीय भाषा, नृत्य, संगीत, वेशभूषा और सामुदायिक भागीदारी का अनूठा मेल दिखाई देता है।

रांची में खास इंतजाम

राजधानी रांची में इस बार करम पर्व को लेकर प्रशासन और नगर निगम स्तर पर भी तैयारियां तेज हैं। पूजा स्थलों और अखड़ों पर साफ-सफाई के साथ रोशनी, सड़क, जल निकासी, स्वास्थ्य और पेयजल जैसी सुविधाओं पर ध्यान दिया जा रहा है।

नगर निगम अधिकारियों ने पूजा समितियों और वार्ड स्तर के प्रतिनिधियों के साथ समन्वय बनाकर स्थानीय जरूरतों को समय पर पूरा करने के निर्देश दिए हैं।

इससे साफ है कि करम पर्व सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं बल्कि शहर और गांव दोनों स्तरों पर सामुदायिक भागीदारी का बड़ा अवसर बन चुका है।

परंपरा के साथ बदलता स्वरूप

समय के साथ करम पर्व के आयोजन के तरीके में भी बदलाव आया है। पहले जहां अखड़ा पूरी तरह पारंपरिक गीत, मांदर और सामूहिक नृत्य का केंद्र होता था, वहीं अब शहरों में मंच, लाइटिंग, साउंड सिस्टम और आधुनिक संगीत भी आयोजन का हिस्सा बन रहे हैं।

फिर भी करम पर्व की मूल भावना—प्रकृति का सम्मान, सामाजिक एकता, भाई-बहन का प्रेम और सामुदायिक खुशहाली—आज भी इसके केंद्र में बनी हुई है।

अब नजर 22 सितंबर पर

करम पर्व की तैयारियां अब अंतिम दौर में हैं। अखड़े सज रहे हैं, पूजा समितियां व्यवस्था को अंतिम रूप दे रही हैं और पारंपरिक गीत-संगीत की तैयारी भी तेज हो गई है।

22 सितंबर को जब करम डाली अखड़ों में स्थापित होगी और मांदर की थाप के साथ पारंपरिक गीत गूंजेंगे, तब झारखंड की धरती एक बार फिर अपनी लोकसंस्कृति और प्रकृति प्रेम की जीवंत तस्वीर पेश करेगी।

Md Asif Equbal
Md Asif Equbalhttps://avatarnews.in
Md Asif Equbal, Avatar News के पत्रकार और लेखक हैं। झारखंड, बिहार और देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों, स्थानीय मुद्दों और जनहित से जुड़े समाचारों पर उनकी रिपोर्ट पढ़ें।
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