26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के पास शुरू हुई इस आपदा ने कुछ ही समय में बड़े इलाके को तबाही के मैदान में बदल दिया। विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और अपने साथ भारी मात्रा में चट्टान और मलबा लेकर नदी में जा गिरा। इसके बाद अचानक आई बाढ़ ने नदी के बहाव को बेहद खतरनाक बना दिया।सबसे ज्यादा चिंता अब उन लोगों को लेकर है, जिनका अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है।ताजा…
नेपाल में ग्लेशियर फटने से तबाही, बाढ़ में सैकड़ों की मौत; हाइड्रोपावर सुरंगों में फंसे मजदूर
26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के पास शुरू हुई इस आपदा ने कुछ ही समय में बड़े इलाके को तबाही के मैदान में बदल दिया। विशेषज्ञों के मुताबिक ग्लेशियर का एक हिस्सा टूटकर नीचे गिरा और अपने साथ भारी मात्रा में चट्टान और मलबा लेकर नदी में जा गिरा। इसके बाद अचानक आई बाढ़ ने नदी के बहाव को बेहद खतरनाक बना दिया।
सबसे ज्यादा चिंता अब उन लोगों को लेकर है, जिनका अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है।
ताजा नेपाली सरकारी आंकड़ों के मुताबिक नेपाल में 903 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि 4,247 लोग अब भी लापता हैं। चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी 16 लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है और आंकड़े अभी भी बदल रहे हैं।
लेकिन इस पूरी त्रासदी का सबसे भयावह पहलू है हाइड्रोपावर परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे मजदूर।
बाढ़ और मलबे ने कई जलविद्युत परियोजनाओं के प्रवेश मार्गों को पूरी तरह बंद कर दिया है। नेपाली अधिकारियों के मुताबिक करीब 933 लोग हाइड्रोपावर परियोजनाओं से जुड़े इलाकों में लापता हैं, और बड़ी संख्या में लोगों के सुरंगों के अंदर फंसे होने की आशंका है।
अब सुरंगों तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
बचाव दल भारी मशीनों से मिट्टी और चट्टानों को हटाने में जुटे हैं। कहीं ड्रिलिंग की जा रही है, तो कहीं सुरंग तक पहुंचने के लिए नियंत्रित विस्फोटों का सहारा लिया जा रहा है। कुछ स्थानों पर ऑक्सीजन पहुंचाने और कैमरों के जरिए अंदर की स्थिति देखने की कोशिश भी की गई है।
हर गुजरता घंटा बचाव अभियान के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि सुरंगों के भीतर फंसे लोगों के लिए ऑक्सीजन, पानी और भोजन की उपलब्धता एक बड़ी चिंता बनी हुई है।
नेपाल की सेना और स्थानीय बचाव दल के साथ अब भारत और चीन के विशेषज्ञ भी इस अभियान में मदद कर रहे हैं।
भारत ने विशेष रूप से सुरंगों में बचाव अभियान का अनुभव रखने वाले सैन्य अधिकारियों और विशेषज्ञों को भेजा है। इसके अलावा राहत सामग्री, चिकित्सा सहायता और जरूरी उपकरण भी नेपाल पहुंचाए जा रहे हैं। भारत की टीमों की मदद खास तौर पर उन इलाकों में महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जहां मलबे के कारण सामान्य रास्तों से पहुंचना बेहद मुश्किल हो गया है।
वहीं चीन की ओर से भी बड़ी संख्या में बचावकर्मी और उपकरण लगाए गए हैं। चीनी टीमें जीवन का पता लगाने वाले उपकरणों की मदद से मलबे के नीचे लोगों की मौजूदगी का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं।
लेकिन बचाव अभियान के सामने सिर्फ मलबा ही चुनौती नहीं है।
खराब मौसम, पहाड़ी इलाका, लगातार बदलता नदी का जलस्तर और नए भूस्खलन का खतरा बचावकर्मियों की मुश्किलें बढ़ा रहा है। कुछ समय के लिए राहत और बचाव अभियान को रोकना भी पड़ा, क्योंकि बाढ़ के बाद बने एक झीलनुमा जलाशय के कारण दोबारा अचानक पानी आने का खतरा पैदा हो गया था।
यानी एक तरफ बचाव दल सुरंगों के अंदर फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हें इस बात का भी ध्यान रखना पड़ रहा है कि कहीं दूसरा जलप्रलय उनके अभियान को ही खतरे में न डाल दे।
इस आपदा ने नेपाल के बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुंचाया है।
कई सड़कें बह गईं, पुल टूट गए और बिजली परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। कुछ इलाकों में बिजली और संपर्क व्यवस्था बाधित होने से राहत सामग्री पहुंचाना भी चुनौती बन गया है। हाइड्रोपावर परियोजनाओं को हुए नुकसान का असर नेपाल की बिजली व्यवस्था पर भी पड़ रहा है।
बाढ़ का असर सिर्फ नेपाल तक सीमित नहीं है। नेपाल-चीन सीमा से लगे तिब्बत के इलाकों में भी भारी नुकसान हुआ है। कई विदेशी नागरिकों के लापता होने की खबरों ने इस आपदा को अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बना दिया है।
इस बीच वैज्ञानिक इस आपदा को लेकर एक और गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
क्या हिमालय में बदलता जलवायु पैटर्न ग्लेशियरों को पहले से ज्यादा अस्थिर बना रहा है?
विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ते तापमान के कारण ऊंचे पहाड़ी इलाकों में बर्फ, चट्टान और पर्माफ्रॉस्ट की स्थिरता प्रभावित हो सकती है, जिससे ग्लेशियर टूटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि किसी एक आपदा के लिए जलवायु परिवर्तन को अकेला कारण बताना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों की अस्थिरता को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है।
नेपाल के लिए इस समय सबसे बड़ी प्राथमिकता एक ही है—ज्यादा से ज्यादा लोगों की जान बचाना।
मलबे में दबे घरों से लेकर बंद सुरंगों तक, हर जगह बचाव दल जिंदगी की तलाश कर रहे हैं। परिवार अपने लापता परिजनों की खबर का इंतजार कर रहे हैं। किसी को उम्मीद है कि उसका अपना व्यक्ति सुरंग के अंदर जिंदा होगा, तो कोई अस्पतालों और राहत शिविरों में अपने परिवार को तलाश रहा है।
यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि नेपाल के सामने खड़ा एक बड़ा मानवीय संकट है।
फिलहाल भारत, चीन और नेपाल की टीमें मिलकर युद्धस्तर पर राहत और बचाव अभियान चला रही हैं। मशीनों से मलबा हटाया जा रहा है, सुरंगों में रास्ता बनाने की कोशिश की जा रही है और हर संभव तकनीक के जरिए जिंदा लोगों तक पहुंचने की कोशिश जारी है।
अब पूरी दुनिया की नजर नेपाल की उन सुरंगों पर टिकी है, जहां शायद कई जिंदगियां अभी भी मदद का इंतजार कर रही हैं।
और सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या मलबे और चट्टानों के नीचे फंसे लोगों तक समय रहते बचाव दल पहुंच पाएंगे?
नेपाल में राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है और हर घंटे के साथ नई जानकारी सामने आ रही है।
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